नाड़ी विज्ञान

वात शरीर सा वायु दोष के शरीर के उत्तम मार्ग से मूलाधार तक क्रमसा पांच भेद किए हैं जो इस प्रकार हैं।

आयुर्वेद के मूल स्तंभ महा पंचभूत ही है शरीर में वात, पित्त, और कफ के भी इन पांच भेदों के आधार पर प्रत्येक दोष के पांच पांच भेद किए गए है तथा इनके आधार पर शरीर में स्थान गुण एवं धर्म का वर्णन कर उनके प्राकृतिक कर्म बताए हैं यही प्राकृत कर्म जब सम रहते हैं निरोगी रहती है और इसके विकृत हो जाने पर आप प्राकृत अवस्था अथवा अस्वस्थता हो जाता है चिकित्सा सिद्धांत में भी पंचमहाभूत ओं की प्रधानता होने से जो मूलभूत चिकित्सा हैउसमें छेड़ हुए दोष एवं महा भूतों की वृद्धि करना और जो बड़े हुए उनका हराश करना तथा समय का पालन करना ही चिकित्सा है।

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